दूसरे राज्यों में कम डिमांड का असर, आलू उत्पादकों की बढ़ी मुश्किलें
कन्नौज: आलू की बंपर पैदावार बनी किसानों के लिए मुसीबत, लागत न निकलने से टूट रहे मकान और पढ़ाई के सपने
उत्तर प्रदेश की प्रसिद्ध आलू बेल्ट में इन दिनों 'सब्जी का राजा' किसानों की आंखों में आंसू ला रहा है। रामगंगा के कछार से लेकर फर्रुखाबाद और कन्नौज के गांवों तक आलू की बेकद्री का आलम यह है कि फसल या तो खेतों में खुले आसमान के नीचे सड़ रही है या कोल्ड स्टोरों के बाहर धूप में खराब हो रही है। बंपर पैदावार के बावजूद मंडियों में सही दाम न मिलने के कारण किसानों की उम्मीदें पूरी तरह चकनाचूर हो गई हैं। जैनापुर और मोहम्मदाबाद जैसे क्षेत्रों के किसानों का कहना है कि जिस आलू को वे 'खरा सोना' मानकर अपने बच्चों की शिक्षा और घर के निर्माण की योजना बना रहे थे, वही अब उनके लिए कर्ज का बोझ बन गया है। आलम यह है कि कोल्ड स्टोर पूरी तरह भर चुके हैं और जो आलू बाहर रह गया है, उसे मंडी तक ले जाने का भाड़ा और मजदूरी भी उसकी कीमत से अधिक बैठ रही है।
कोल्ड स्टोरों की क्षमता हुई पूरी और मंडी में कौड़ियों के भाव बिक रही फसल
फर्रुखाबाद से लेकर फिरोजाबाद तक के लगभग 2363 कोल्ड स्टोर अपनी पूरी क्षमता के साथ भर चुके हैं, जिनमें करीब 172 लाख मीट्रिक टन आलू भंडारित है। इसके बावजूद भारी मात्रा में आलू अभी भी खेतों और बागों में पड़ा हुआ है क्योंकि स्टोर मालिकों ने अब और जगह न होने की बात कहकर हाथ खड़े कर दिए हैं। सातनपुर मंडी और अन्य स्थानीय बाजारों में आलू की कीमत महज तीन सौ से पांच सौ रुपये प्रति क्विंटल रह गई है, जिससे किसानों का डीजल और मजदूरी का खर्च भी नहीं निकल पा रहा है। कई किसान तो इतने निराश हैं कि उन्होंने फसल को छायादार बागों में बोरों में भरकर रख दिया है और इस उम्मीद में बैठे हैं कि शायद कभी भाव सुधरे, हालांकि धूप और गर्मी के कारण आलू के खराब होने का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है।
लागत और मुनाफे का बिगड़ा गणित और औद्योगिक इकाइयों की कमी का असर
एक प्रगतिशील किसान के अनुसार प्रति बीघा आलू उगाने में करीब 12 से 15 हजार रुपये की लागत आती है, जबकि खुदाई, पैकिंग और परिवहन का खर्च इसमें अलग से जुड़ता है। यदि औसत पैदावार के हिसाब से बिक्री मूल्य को देखा जाए, तो किसानों को प्रति बीघा हजारों रुपये का सीधा घाटा उठाना पड़ रहा है। सरकारी क्रय केंद्रों पर भी मानक इतने कड़े हैं कि आम किसान वहां अपनी फसल बेचने में कठिनाई महसूस कर रहा है। विशेषज्ञों और कोल्ड स्टोर संचालकों का मानना है कि इस संकट का मुख्य कारण अन्य राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल और असम में निर्यात का न होना और स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण इकाइयों का अभाव है। यदि सरकार आलू पाउडर बनाने की फैक्ट्रियां या अन्य प्रसंस्करण उद्योग लगाए, तो किसानों को इस तरह की बर्बादी से बचाया जा सकता है।
शिक्षा और भविष्य की योजनाओं पर पड़ा गहरा आर्थिक संकट
आलू के इस संकट ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है, जिसका सीधा असर सामाजिक स्तर पर भी दिखने लगा है। कई परिवारों में बच्चों की उच्च शिक्षा की फीस भरने के लिए अब साहूकारों से कर्ज लेने की नौबत आ गई है क्योंकि आलू की बिक्री से कोई आय नहीं हुई। इंजीनियरिंग और अन्य पेशेवर कोर्स कर रहे छात्रों का भविष्य अब अधर में लटका नजर आ रहा है, क्योंकि उनके माता-पिता ने फसल की कमाई के भरोसे ही बड़े सपने देखे थे। इसी तरह जिन किसानों ने अपने कच्चे मकानों को पक्का बनाने के लिए छत की ढलाई की तैयारी की थी, उनके काम बीच में ही रुक गए हैं। उत्तर प्रदेश की यह पूरी बेल्ट इस समय एक गंभीर कृषि संकट के दौर से गुजर रही है, जहां किसान अपनी मेहनत की फसल को बर्बाद होते देखने के लिए मजबूर है।


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