स्कूलों में मंत्रोच्चार पर बढ़ा विवाद, कांग्रेस की याचिका के बीच गजेंद्र यादव का बड़ा बयान
बिलासपुर| छत्तीसगढ़ के सरकारी विद्यालयों में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान मंत्रोच्चार अनिवार्य किए जाने के शासकीय आदेश पर मचे सियासी बवाल ने अब कानूनी रूप ले लिया है। इस फैसले के विरोध में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस से जुड़े पदाधिकारियों ने राज्य सरकार के इस आदेश को असंवैधानिक बताते हुए माननीय उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच सूबे के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव का एक बड़ा और तल्ख बयान सामने आया है। उन्होंने सरकार के फैसले का पुरजोर बचाव करते हुए कहा कि बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ नैतिक संस्कार देना इस नीति का मुख्य उद्देश्य है, लेकिन यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस इस सकारात्मक पहल को भी अदालत के कटघरे में खींच ले गई है।
'बच्चों में सकारात्मक ऊर्जा और संस्कार जगाना हमारा लक्ष्य'
स्कूलों में मंत्रोच्चार को लेकर दायर याचिका पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव ने स्पष्ट किया कि राज्य शासन ने यह निर्णय किसी राजनैतिक एजेंडे के तहत नहीं, बल्कि छात्रों को मानसिक रूप से मजबूत बनाने, उनके भीतर सकारात्मक सोच का संचार करने और उन्हें भारतीय संस्कृति के उत्तम संस्कारों से जोड़ने के लिए लिया है। उन्होंने विपक्ष पर हमला बोलते हुए कहा कि जब भी बच्चों के हित में या संस्कृति के संरक्षण के लिए कोई कदम उठाया जाता है, तो कांग्रेस पार्टी राजनीति चमकाने के लिए अड़ंगेबाजी शुरू कर देती है। मंत्री ने आगे जानकारी दी कि इस पूरे विवादित मामले पर बिलासपुर स्थित हाई कोर्ट में कल (गुरुवार को) अहम सुनवाई होनी है, जिसके बाद अदालत के रुख से स्थिति पूरी तरह साफ हो जाएगी।
क्या है पूरा विवाद और कांग्रेस की आपत्ति?
दरअसल, यह विवाद तब शुरू हुआ जब स्कूल शिक्षा विभाग ने राज्य के सभी प्राथमिक, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक सरकारी स्कूलों के लिए एक नया दिशा-निर्देश जारी किया। इसके तहत सुबह की असेंबली में कुछ चुनिंदा श्लोकों और मंत्रों का उच्चारण अनिवार्य कर दिया गया।
कांग्रेस और याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और सरकारी खर्च पर चलने वाले शिक्षण संस्थानों में किसी विशेष धार्मिक पद्धतियों या मंत्रों को अनिवार्य नहीं किया जा सकता। विपक्ष का आरोप है कि यह आदेश छात्रों की धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन करता है। वहीं दूसरी ओर, सत्तापक्ष इसे केवल बच्चों की एकाग्रता और नैतिक मूल्यों को बढ़ाने वाला एक सामान्य कदम बता रहा है। बहरहाल, अब सबकी नजरें कल न्यायालय में होने वाली कानूनी बहस और आने वाले फैसले पर टिकी हुई हैं।


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