नवकारसी विवाद पहुंचा राष्ट्रीय स्तर पर, इंदौर में बड़ा कानूनी एक्शन
इंदौर: मध्यप्रदेश की व्यापारिक राजधानी इंदौर में महावीर जन्म कल्याणक के पावन अवसर पर शुरू हुआ एक मामूली विवाद अब राष्ट्रीय स्तर पर जैन समाज के बीच गहरी चिंता का विषय बन गया है। श्वेतांबर जैन समाज के दो प्रमुख धड़ों के बीच उपजा यह टकराव तब कानूनी गलियारों में पहुंच गया, जब 50 लाख रुपए के मानहानि नोटिस ने इस विवाद को एक नया और गंभीर मोड़ दे दिया। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और सोशल मीडिया पर 22 हजार से अधिक प्रतिक्रियाओं के साथ यह मुद्दा अब केवल स्थानीय नहीं रहा, बल्कि देशभर के जैन समाज के विमर्श के केंद्र में आ गया है, जहाँ लोग समाज की एकता को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
तुच्छ घटना से उपजा राष्ट्रीय विवाद
विवाद की जड़ें महावीर जन्म कल्याणक के दिन आयोजित 'नवकारसी' (सामूहिक भोज) कार्यक्रम में छिपी हैं, जहाँ एक ट्रैक्टर खड़ा होने को लेकर बहस शुरू हुई थी। बताया जा रहा है कि यह पूरी स्थिति केवल एक वाहन चालक की मानवीय भूल के कारण उत्पन्न हुई थी, जिसके लिए संबंधित इवेंट कंपनी के संचालक ने श्री नाकोड़ा जैन कॉन्फ्रेंस से लिखित माफी भी मांग ली थी। हालांकि, मामला तब बिगड़ गया जब घटना के लगभग एक महीने बाद श्वेतांबर जैन महासंघ द्वारा कुछ आरोपों के साथ एक पत्र जारी किया गया। श्री नाकोड़ा जैन कॉन्फ्रेंस ने इस पत्र को दुर्भावनापूर्ण करार देते हुए इसे अपनी छवि धूमिल करने का प्रयास बताया और महासंघ को कानूनी नोटिस थमा दिया।
समन्वय की कमी और नेतृत्व पर उठते सवाल
इस विवाद की गूंज अब देश की 80 से अधिक आचार्य परंपराओं और विभिन्न गच्छों तक पहुंच चुकी है। समाज के भीतर यह मंथन चल रहा है कि अहिंसा और 'अनेकांतवाद' (समन्वय) की विचारधारा को मानने वाले समुदाय में एक छोटी सी बात मान-सम्मान की लड़ाई में कैसे बदल गई। श्री नाकोड़ा जैन कॉन्फ्रेंस के राष्ट्रीय अध्यक्ष अक्षय जैन का आरोप है कि महासंघ ने संवाद के सभी रास्ते बंद कर दिए और हठधर्मिता का परिचय दिया, जिसके कारण उन्हें समाज की मर्यादा की रक्षा हेतु कानूनी कदम उठाना पड़ा। दूसरी ओर, आम समाजजन इसे नेतृत्व की विफलता और संगठनात्मक तालमेल की कमी के रूप में देख रहे हैं।
सामाजिक समरसता और समाधान की पुकार
देशभर के विभिन्न राज्यों से आ रहे संदेशों में जैन धर्मावलंबियों ने इस कानूनी लड़ाई पर गहरा दुख व्यक्त किया है। समाज के प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि धार्मिक आयोजनों से जुड़े विषयों को अदालत ले जाने के बजाय बंद कमरे में आपसी बातचीत से सुलझाया जाना चाहिए था। अधिकांश लोगों का तर्क है कि इस तरह के सार्वजनिक विवादों से समाज की छवि धूमिल होती है और भाईचारा प्रभावित होता है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या समाज के वरिष्ठ पदाधिकारी और आचार्य भगवंत इस मामले में हस्तक्षेप कर इसे शांतिपूर्ण समाधान की ओर ले जाएंगे, या फिर यह 'अस्मिता की जंग' कानूनी चौखट पर ही खत्म होगी।


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