ईरान तनाव के बीच भारत की रणनीति, नए बाजारों पर फोकस
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान संकट के बीच भारत अपनी व्यापारिक रणनीति में बड़ा बदलाव कर रहा है। जोखिम को कम करने और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए भारत अब अपने व्यापारिक दायरे का विस्तार कर नए वैश्विक बाजारों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
नए बाजारों के साथ रणनीतिक समझौते
भारत वर्तमान में कई प्रमुख देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है। इनमें शामिल हैं:
- प्रमुख देश: कनाडा, इजरायल, ऑस्ट्रेलिया, पेरू, चिली और मेक्सिको।
- भविष्य की वार्ता: फिलीपींस और मालदीव के साथ भी व्यापारिक संवाद को आगे बढ़ाया जा रहा है।
- व्यापार में उछाल: आंकड़ों के अनुसार, समझौतों के चलते भारत का कुल व्यापार, जो 2006 में मात्र 4.6% था, साल 2024 में बढ़कर 28.8% के स्तर पर पहुंच गया है। अमेरिका के साथ समझौता होने के बाद इसमें और भी बड़ी तेजी आने की उम्मीद है।
निर्यात के पारंपरिक और उभरते केंद्र
नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारत के निर्यात की दिशा में सकारात्मक बदलाव आ रहे हैं:
पारंपरिक बाजार: अमेरिका और यूरोप (विशेषकर नीदरलैंड्स) अभी भी भारतीय निर्यात के मजबूत आधार बने हुए हैं।
- उभरते क्षेत्र: उत्तर-पूर्व एशिया और पूर्वी अफ्रीका जैसे क्षेत्रों का महत्व लगातार बढ़ रहा है, जो भारतीय व्यापार के विविधीकरण (Diversification) का प्रमाण है।
- शीर्ष साझेदार: भारत के कुल निर्यात में अमेरिका, यूएई और हांगकांग की कुल हिस्सेदारी लगभग 70-75% है। हाल ही में स्पेन भी भारत के शीर्ष-10 निर्यात गंतव्यों की सूची में शामिल हुआ है।
खाड़ी क्षेत्र की अहमियत और चुनौतियां
भारत के कुल आयात-निर्यात में खाड़ी देशों की 12% हिस्सेदारी है:
- प्रमुख साझेदार: यूएई और सऊदी अरब भारत के सबसे बड़े व्यापारिक सहयोगियों में शामिल हैं। यूएई विशेष रूप से भारत के लिए अफ्रीका और यूरोप तक पहुँचने का एक बड़ा केंद्र (Re-export Hub) है।
- ऊर्जा संकट: रिपोर्ट के मुताबिक, खाड़ी क्षेत्र के ऊर्जा बुनियादी ढांचों पर हमलों ने कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर अस्थिरता पैदा कर दी है। इससे वैश्विक स्तर पर परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ गई है।
आर्थिक प्रभाव और वैश्विक चेतावनी
बहुपक्षीय संस्थानों ने चेतावनी दी है कि यदि ऊर्जा की कीमतों में इसी तरह वृद्धि जारी रही, तो यह वैश्विक जीडीपी (GDP) की रफ्तार को धीमा कर सकती है। इसका सबसे बुरा असर ईंधन आयात पर निर्भर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के व्यापार सुधार पर पड़ सकता है।


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