पिता हैं जीवित, तो क्या वैशाख अमावस्या पर बेटा कर सकता है पितरों का तर्पण? क्या कहते हैं शास्त्र के नियम
वैशाख अमावस्या के दिन स्नान और दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है, लेकिन यह दिन पितरों के लिए विशेष होता है. इस दिन आप अपने पितरों के लिए तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान आदि कर सकते हैं. इससे पितर प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद देते हैं. वैशाख अमावस्या का दिन पितृ दोष से मुक्ति का अवसर प्रदान करता है. वैशाख अमावस्या को प्रात:काल में स्नान के बाद पुत्र अपने मृत पिता और अन्य पूर्वजों के लिए तर्पण और श्राद्ध करता है. इससे पितर प्रसन्न होकर उसके और परिवार की उन्नति के लिए आशीर्वाद देते हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी के पिता जीवित हैं तो वह पुत्र अपने पितरों के लिए तर्पण कर सकता है या नहीं?
किसे है तर्पण और श्राद्ध का अधिकार?
गरुड़ पुराण के अनुसार, यदि किसी के पिता की मृत्यु हो जाती है तो उसके श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण आदि का पहला अधिकार उसके बेटे को होता है. यदि बेटा नहीं है तो पत्नी, बेटी, छोटा भाई, पोता, भतीजा, नाती आदि कर सकते हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध और तर्पण करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और मृत व्यक्ति की आत्मा को शांति मिलती है.
इस सवाल पर कानपुर की ज्योतिषाचार्या स्वाति सक्सेना के अनुसार, पिता के जीवित रहते पुत्र को श्राद्ध या पिंडदान का अधिकार नहीं होता है. लेकिन कोई भी व्यक्ति अपने पिता के जीवित रहते पितरों के लिए तर्पण कर सकता है. शास्त्रों में इसके लिए मनाही नहीं है. आप तर्पण से अपने पितरों को तृप्त करते हैं, उससे वे प्रसन्न होते हैं. पिता के जीवित रहते पितरों का तर्पण करने में कोई बुराई और रोक नहीं है.
किन लोगों का कर सकते हैं तर्पण?
वैशाख अमावस्या के दिन बेटा चाहे तो तर्पण दे सकता है. वह अपने दादा, परदादा, दादी, परदादी, नाना, नानी, मामा, मामी, चाचा, चाची आदि को तर्पण दे सकता है. शास्त्रों में तीन पीढ़ियों तक यानि पिता, दादा और परदादा की पीढ़ी तक तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान आदि करने का विधान है.
वैशाख अमावस्या पर कैसे करें तर्पण?
वैशाख अमावस्या पर अपने पितरों का तर्पण करना है तो आप ब्रह्म मुहूर्त में उठकर दैनिक क्रियाओं से निवृत हो जाएं और फिर स्नान कर लें. उसके बाद हाथ में कुशा की पवित्री धारण करें. जल में काला तिल और सफेद फूल लेकर जिन पितरों को तर्पण देना है, उनके नाम का स्मरण करें, फिर कुशा के आगे वाले भाग से जल अर्पित करें, तर्पण दें. कुशा के अग्र भाग से पितरों को तर्पण देते हैं. वह जल पितरों को प्राप्त होता है.
कब-कब कर सकते हैं तर्पण?
आप हर माह की अमावस्या और पूर्णिमा के दिन पितरों के लिए तर्पण कर सकते हैं. आप चाहें तो व्रत ओर त्योहारों पर भी तर्पण दे सकते हैं. यह पितरों की कृपा प्राप्ति का माध्यम है.


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