बंगाल में राहुल गांधी की एंट्री से सियासत गर्म, पीएम मोदी की 8 रैलियों से बढ़ेगा मुकाबला?
कोलकाता. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के लिए चुनावी बिसात बिछ चुकी है. 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को होने वाले मतदान से पहले राज्य की राजनीति में दिग्गजों का जमावड़ा लगा हुआ है. पीएम मोदी की बंगाल में 8 रैलियां और रोड-शो के बाद अब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी मोर्चा थाम लिया है. केरल में पूरा समय देने के बाद और असम में एक-दो रैलियां करने के बाद राहुल गांधी बंगाल के रण में मंगलवार को उतर गए हैं. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि राहुल गांधी की रैलियांटीएमसी के लिए ‘वोट कटवा’ साबित होंगी या बीजेपी के गणित को बिगाड़ेगी? क्या राहुल गांधी के बंगाल में मंगलवार को तीन ताबड़तोड़ रैलियां कांग्रेस को खाता खोलने में मददगार साबित होगी?
राहुल गांधी अब बंगाल पहुंचे हैं, लेकिन पीएम मोदी बीते एक सप्ताह से बंगाल में एक बाद एक कुल आठ रैलियां कर चुके हैं.पीएम मोदी कटवा, जंगीपुर, मुर्शिदाबाद, सिलीगुड़ी, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, बीरभूम और कुशमंडी समेत कई महत्वपूर्ण जिलों में जनसभाएं कर चुके हैं. मोदी की रैलियों का मुख्य फोकस तीन बिंदुओं पर रहा है. पहला- टीएमसी शासन में ‘कट मनी’ और भर्ती घोटालों पर प्रहार. दूसरा- सीएए के जरिए शरणार्थियों को सुरक्षा और घुसपैठियों को बाहर करने का वादा. तीसरा- महिलाओं के लिए मासिक वित्तीय सहायता का ऐलान, जो ममता बनर्जी के ‘महिला वोट बैंक’ को चुनौती दे रहा है. मोदी की 6 गारंटी जिसमें 7वें वेतन आयोग को लागू करने का वादा बंगाल में लोगों की जुबां पर है.
वहीं, मंगलवार यानी 14 अप्रैल को राहुल गांधी ने मालदा और रायगंज उत्तर दिनाजपुर में अपनी रैलियों के साथ बंगाल में कांग्रेस के प्रचार का शंखनाद किया है. सात साल बाद मालदा की धरती पर उनकी वापसी कांग्रेस के लिए एक नई उम्मीद की तरह है. कांग्रेस अपने पुराने गढ़ों को फिर से हासिल करना चाहती है. राहुल अपनी रैलियों में ममता सरकार की ‘विफलता’ के साथ-साथ भाजपा की ‘विभाजनकारी राजनीति’ पर भी हमला बोल रहे हैं, ताकि वे मुस्लिम और धर्मनिरपेक्ष मतदाताओं को अपनी ओर खींच सकें.
क्या ममता सरकार पर पड़ेगा असर?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, पीएम मोदी की रैलियों ने भाजपा के पक्ष में एक मजबूत लहर पैदा की है, जिससे ममता बनर्जी के लिए एंटी-इंकम्बेंसी यानी सत्ता विरोधी लहर का सामना करना मुश्किल हो गया है. वहीं, राहुल गांधी की सक्रियता से चुनाव का स्वरूप ‘बहुकोणीय’ हो सकता है, जो टीएमसी के ‘वोट बैंक’ को और बिखेर सकता है. इससे बीजेपी के बजाय टीएमसी को ज्यादा नुकसान हो सकता है.
ममता बनर्जी के लिए खतरा यह है कि अगर अल्पसंख्यक मतदाता ओवैसी और कांग्रेस की ओर झुकते हैं, तो उनका परंपरागत वोट बैंक कमजोर हो सकता है. भाजपा को उम्मीद है कि पीएम मोदी की रैलियां और अमित शाह का आक्रामक प्रचार उन्हें 148 सीटों के जादुई आंकड़े तक पहुंचा देगा. चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में यह साफ है कि बंगाल की जनता अब किसी ‘एक तरफा’ लहर में नहीं है. पीएम मोदी के ‘डबल इंजन’ और ‘विकास’ के वादे बनाम ममता बनर्जी की ‘बंगाली अस्मिता’ की लड़ाई में राहुल गांधी की एंट्री एक नया रोमांच भर रही है. 4 मई को आने वाले नतीजे ही बताएंगे कि बंगाल की जनता ने ‘परिवर्तन’ को चुना या ‘दीदी’ पर एक बार फिर भरोसा जताया.


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